मूढ़मति इंसान धन संपत्ति जोड़ने में जीवन खपा डालता है। संचय करने की प्रवृत्ति उसे अशांत बनाए रखती है। मनुष्य पदार्थों की चिंता करता है, लेकिन पदार्थों को देने वाले का चिंतन नहीं करता। जिस दिन वह चिंता की जगह परमात्मा का चिंतन शुरू कर देगा, उसका सहज ही कल्याण हो जाएगा। - आदि शंकराचार्य